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आंखों का भ्रम था , जिसे हमने मय समझा ।

 आंखों का भ्रम था , जिसे हमने मय समझा ।

 चखा जब उसे तो.....तो वो जहर निकाला।

समझे जिसे हम प्यास , 

उफनाती हुए दिल के समंदर में । 

वो मोहब्बत की आड़ में ,दगा थी उनकी ।

मीठा जहर भरा था , उनके जहन में ।

 ना तलास कर , कोई नही है यहाँ दर्द 

 बांटने वाला ।

चाल बाज़ है बहुत वो हमदर्द , 

चार दिन में ही बदल जाते है ।

मरहम के नाम पर , वो जख्म और दे जाते है ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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