आये थे हम तेरे दर पर , आवाज दी तुम्हें ।
तुम आयीं मगर , नींद में बोझिल ।
अल्हड़ सी मस्त आना तेरा ।
और अपनी आँखों को हाथों से मशलना तेरा ।
बड़ी खूबसूरत सी , लग रही थी मानो ।
चांदनी में जैसे कोई परी , नहाई हुई सी ।
मेरे मन को पिघला रही थी , जैसे मोम की तरह ।
लौट आये हम वापस दर से तेरे , लुटे हुए सौदागरों की तरह ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
Jay ho
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