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ज़रा देखो तो इक नज़र , इधर भी करम फरमाओ ।

 ज़रा देखो तो इक नज़र , इधर भी करम फरमाओ ।(२)

 जरा देखो तो इक नज़र....ज़रा देखो तो इक नज़र , इधर भी करम फरमाओ ।

 के बैठे है हम सुबह से , तेरे दीदार की खातिर ।

 अपने रुख से हाँ..हाँ , अपने रुख से इक बार , नक़ाब तो हटाओ ।

के बैठे है हम..के बैठे है हम तेरे दीदार की खातिर ।

तेरी महफ़िल की खातिर ...तेरी महफ़िल की खातिर हमने मयखानों में जाना भी छोड़ा ।

हर साँसों में बसी थी जो , जाम ए शराब वो पीना भी छोड़ा ।

तेरे महफ़िल के , चर्चे जो ये खास हुए ।

तेरे होठों के हसीं सुर्ख प्यालों में । 

हुस्न ए जाम का नशा खास हुए ।

पी जाऊं पी जाऊं न फिर , होश में आऊँ ।

इक बार ही सही , इक बार ही सही  दो घूट पिला दे ।

ज़रा देखो तो इक नज़र , इधर भी करम फरमाओ ।(२)

अपने रुख से हाँ..हाँ , अपने रुख से इक बार , नक़ाब तो हटाओ ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी




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