जिंदगी की निश्चित , परिभाषा कोई नही ।
अनुभूतियों पर आधारित अलग अलग आयामों में , डालती बनती बिगड़ती है जिंदगी ।
दुःख से दुःखी है जिंदगी, सुख से सुखी है जिंदगी ।
परिस्थितियों पर , आधारित है जिंदगी ।
न तेरे हाथ में है ये न मेरे हाथ में है ,
ये तो समय के हाथ की , कठपुतली है जिंदगी ।
मैं में बसी है तू में बसी है , हर किसी में अलग अलग बसी है ।
किसी में शीतल है तो , किसी में तपिस है जिंदगी ।
@रतूडी
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