फ़िज़ाओं में जहर है , चारों और कोरोना का कहर है ।
फासले ही बचे है अब , होने को जिंदा ।
अपने हो या पराये , आजमाओ ये भी ।
मर गए तो न संस्कार ही , अपनों के हाथ न कब्र में दफन ही ।
न जाने कौन किस का , किस का कौन हो तीमारदार ।
क्या मालूम बन्द लिफाफे में लिपटा , कौन हो किसका हो शरीर ।
खबर किसकी हो जाने की , किसको पहुँचे क्या मालूम ।
किस से किस की जले चिता , कौन किसके हाथों हो कब्र में दफन ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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