▪️अब तो वो बहुत दूर जा , चुके होंगें ।
आशाओं की जो थी , इक किरन ।
शायद नज़रों से भी , तेरी ओझल ।
ओंस से भी अब , बुझे प्यास कैसे ।
दिनकर भी अब , पूरब से झाँक रहा है ।
सुलगती देह तड़पता मन ,
विरह की अग्नि में झुलस रहा है ।
▪️आते आते सावन मेरा ,
क्यों चला गया बिन बरसे ।
आ जा पिया लौट के आ जा ,
बन बदरा मोहे पे बरस जा ।
मैं आलिंगन को तोसे पिया ,
मन मोरा तेरे प्रेम को तरसे ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें