वो जो ख्वाबों में देखता हूँ मैं तुझे के ,
तुम मेरे हो सखी ।
काश वो हक़ीकत होता तो , अच्छा होता ।
मुद्दतों से चाह है तुम्हें काश ,मेरी चाहतों का सिला ।
हासिल मुझे तुम होते , तो अच्छा होता ।
ना गुजरती तन्हां मेरी ये रातें , न बेकरार ये दिल का बेचैन दिन होता ।
होती तुमसे हर रोज मुलाकातें , तो अच्छा होता ।
पतझड़ सा हो गया है , मेरे दिल का चमन ।
बहारों ने भी , अब आना छोड़ दिया ।
आ जाती बहारें शायद तेरे आने पर , तुम दिल मे फिर आ जाते तो अच्छा होता ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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