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ना जाने कब तलक ,ताकना होगा इन टूटे हुए झरोखों से ।

ये बेबसी मेरी उफ्फ , इक इंतज़ार की ।

ना जाने कब तलक , 

ताकना होगा इन टूटे हुए झरोखों से ।

मुझरायी काया धुंधली नज़र , 

कंपकंपाते हाथों ने मेरे ।

अरदास में अब , बस तुझ से यही मांगा है ।

आ मौत के अब नही होता , इंतज़ार और तेरा ।

बहुत जी लिया हूँ , घुट घुट कर अब मैं । 

ऐ खुदा तेरे , इस जहां में ।

अब भेज भी दे तू , कोई फरिश्ता मेरी मौत का ।

ताकि मैं सकूँन से , अब सो सकूँ ।

फिर कभी न जागूँ मैं , तेरे इस जहां में ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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