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ये जग है दो मुँही , कहीं भी ,जीने नही देती है ।

 ये जग है दो मुँही , 

कहीं भी ,जीने नही देती है ।

न हँसने , न रोने ही देती है ।

ये दुनिया है दुष्ट बड़ी ,

सही को गलत और,  गलत को सही कहती है ।

भ्रम जाल के ताने बाने में , 

उलझी हुई है , आम जन ।

 कैसे पाए चैन भला , 

भय के इस , परिवेश में कोई ।

कौन मित्र और , बैरी कौन ?

 न जाने कहाँ से आज जाए , अदृश्य बरछी ।

घात करने को ,

इस कारण , व्याकुल है हर मन ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी



 


 

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