रहा इश्क मेरा ,चढ़ते सूरज सा ।
के ,
धीरे धीरे मोहब्बत की , शाम हो गयी ।
हर रातें गुजार ली हमने , आसरे पर यही ।
कभी तो होगी मेरे इश्क की ,
कोई सुबह वो नयीं ।
कैसी कटी जिंदगी , तड़प और बदगुमानियाँ में ,
क्या बताये ।
अब तो जीने की हसरतें खत्म ,
तमाम हो गयी ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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