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कभी बहे जिस जगह में , अरमान !

कभी बहे जिस जगह में , 

अरमान !

बन कर अश्क ए दरिया ।

आज वहां ! 

रेत ही रेत ,चारों ओर !

नज़र आते है ।

समझ सको तो , काफी है ।

पेश ए खिदमत में .

यह अल्फ़ाज़ !

बचा क्या है अब और , 

जो लूट सके कोई ।

हम तो अपना , सब कुछ !

लुटाये बैठे है ।

अपनी नज़ाकत से ।


✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी


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