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अपना तो सूरज निकले !

 अपना तो सूरज निकले !

एक अरसा हो गया है , 

शायद ।

आशाओं की राहें तंग और , 

अंधकार से घिरे ।

मन को लिए , अब भी ।

भटक रहा हूँ मैं , जमानों से ।

इक लौ की , तलाश लिए ।


✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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