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लो उठाओ मन दर्पण , हृदय प्रतिविम्ब दो उस ओर

 लो उठाओ मन दर्पण , हृदय प्रतिविम्ब दो उस ओर ।

किया हो जिसने समर्पण , अंधकार की ओर ।

 कुछ अर्पित करें भाव , हृदय पुष्पांजलि से ।

 प्रेम जागृत हो उसके , बैरागी मन में ।

छोड़ों कामस्त्र उस , आपराजिता की ओर ।

पिघला दो चट्टान , उस कठोर ह्रदय की ।

करके सृंगार , नूतन पुष्प सुंगंधित ।

कर स्नान चंद्रिका में , लट बिखरे मुखमंडल की ओर ।

 भीगे तन प्रेम ओंस में ,

टपके उस कठोर , धारा की ओर ।

विचरण हो हृदय , हृदय में ।

फूटे अंकुर निश्छल प्रेम के ,

ले चल उसको ऐसी , उर्वरक धरा की ओर ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

 


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