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स्वयं पर कोढ़ होवे और , दूजे की फुंसी से घृणा ।

 स्वयं पर कोढ़ होवे और , 

दूजे की फुंसी से घृणा ।

धन्य है भारत के , विचित्र विपक्षी ।

बता भी दो के अब  ,  

सत्ता के लिए अभी और , कितना है  गिरना ।

हमने जो चुनना था , वो हमने चुन लिया ।

देश को सुरक्षित हाथों में , हमने सौंफ दिया है ।

युग-युगांतरों पश्चात कदाचित , 

चाणक्य काल लौट आया है ।

घर द्रोही कर रहे है गठबंधन , 

देश को कैसे अब लूटा जाए ।

कर रहे है बाहरी देशों से संधि कि , 

भारत को कैसे नोंचा जाए ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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