समर सर पर पड़ा था , तब वो बुद्ध बने ।
मातृभूमि लुट रही थी , और वो शुद्ध बने ।
संभाली डोर रण की , तब पुष्यमित्र ने ।
कर के नाश धर्म द्रोही बृहद्रथ का ,
शत्रुदल पर टूट पड़े ।
की पुनर्स्थापना वैदिक धर्म की ,
शुंग ने ।
सनातन धर्म का , उत्थान किया ।
पुरखों के बलिदानों के कारण तू ,
आज का हिन्दू ठाठ से है जिया ।
न आराम कर , आंख कान खोल कर रख ।
फिर वही पुराना दौर दोहराया जाएगा ।
तुझे कुचलने के लिए ,
फिर वो मुगल-फ्रिंगी नए , भेष में लौट आएगा ।
कमर कस के रख बन पुष्य मित्र , चंद्र गुप्त मौर्य ,
वीर शिवाजी और बन चौहान पृथ्वी राज ।
बन हर वो वीर तुम छवि स्मरण रख , चाणक्य नीति कौशल का प्रभाव को याद रख ।
हो चेतन मन को ,राणा का चेतक बना ।
तेज गति मगर धैर्य से , कदम दर कदम रख ।
कर प्रतिकार हर अन्याय पर ,
जो हो समाज और तुझ पर ।
धर्मरक्षक का अपने , कर्तव्य का पालन कर ।
रुक न झुक न , संभाल चंद्रहास रण कर ।
🚩जय भवानी !🚩
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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