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सरल तरुणामयी तेरा आँचल , सघन ब्योम सा ।

सरल तरुणामयी तेरा आँचल , सघन ब्योम सा ।

मानो प्रकृति ने स्वयं किया हो , सृंगार तुझ पर ।

 आच्छादित प्रेम तेरा , 

मधुर सरस , तप्ती मेरे मन धारा पर ।

बरसे सावन रिमझिम रिमझिम , 

अंकुरित प्रेम मेरे हृदय का , सींचे तेरा मन ।

रहे दीर्घ शीर्ष पर , यह प्रेम-पाश तेरा मेरा ।

 शिखर पर पहुंचे ,नभ को छुलें प्रेम हमारा ।

क्या पूर्ण होगी सखी ! 

तुम संग कभी मेरी , यह अभिलाषा ।


✍️ज्योत प्रसाद रतूड़ी 


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