अब आदत सी ,
होने लगी है हमें ।
तुम्हें , भूल जाने की ।
हाँ ...
वो इक दौर भी ,
गुजरा था ।
जब तेरे बिन ...
जीना दुश्वार था ,
कभी ।
जब....
प्यार रहा ही नहीं ,
हमारे बीच कभी ।
फिर...फिर क्यों ?
मुझे कहना ,
पड़ रहा है कि...
अब....
आदत सी ,
होने लगी है हमें ।
तुम्हें , भूल जाने की ।
इक तरफ़ा....
मोहब्बत रही मेरी ,
होकर मलंग ।
तेरे सिवा न ,
तसब्बुर में , रहा कोई ।
जो बन सके , मेरी ग़ज़ल ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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