ज्यादा थे मरते गए ,
कुछ डर कर ।
कुछ लालच में आकर ,
धर्म से मज़हब में ।
बदलते गए ,
कम होते गए ।
सन 1975 का काला साल ,
दो हज़ार मारे गए ।
गलत ऑपरेशन से ।।
और नशबंदी की गयी ,
बासठ हज़ार ।
कॉग्रेस की करतूत जब ,
पड़ने लगी उसी पर भारी ।
दे कर लालच रुपयों का ,
परिवार नियोजन की योजना भी चलाई ।
इसमें भी फिर से , सनातनी जनता ही फसाई ।
हम दो हमारे दो अब , हमारे एक हो गए है भाई ।
छला खूब लाठी वाले ने,
गुलाब और नकली नाक वाली ने ।
वो हिन्दू ही थे नपुसंक ,
जो आये इनके बहकावे में ।
कर के नीलाम अपनी आबरू ,
शोल बन कर चिपके रहे ।
सनातन के गद्दार , इनके जूते में ।
अभी भी वक्त है होश में आओ ,
अपने सनातन को बचाव।
वरना वो दिन दूर नही अब , जब ।
खुद को तुम , बचा न सकोगे ।
तुम कौन हो जब तुम ?
स्वयं को भी फिर कभी , पहचान न सकोगे ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें