तेरे अथाह प्रेम भव सागर से , क्या ?
मिलेगी एक अंजुली भर , प्रेम जल मुझे ।
मन कंठ शुष्क है वर्षो से , प्रेम तृष्णा में ।
हुआ मरु हृदय धरा मेरा , बिन प्रेम जल के ।
हतास हूँ मैं , निराश हूँ , उपेक्षित हूँ ।
सुष्क सैकत हूँ , तपते मरुस्थल की मैं ।
नही है कोई भिज्ञता मेरी यहाँ ।
अंधड़ संग चला जाता हूँ मैं , यहाँ से वहाँ ।
थक गया हूँ अब ,
मन करे रुकूँ अब , किसी सागर तट पर ।
जहां मिलता रहे प्रेम जल , मेरे ब्याकुल मन को ।
वो अथाह प्रेम भव सागर सखी , तुझसा और कहाँ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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