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लो खेलो ! ले आया हूँ मैं ,

 लो खेलो ! ले आया हूँ मैं 

दिल अपना , मुरम्मत करवाकर ।


ध्यान से जरा , देखो ! 

कहीं फिर से टूट न जाये ।


क्योकि ! तेरे इस शहर में , 

दिल साज़ नही मिला करते ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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