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तू दिल में बसी है इस , कदर ।

तू दिल में बसी है इस , कदर ।

के हर तरफ जिधर भी ,  देखूं ।

तू ही तू आती है , नज़र ।

मेरी मदहोशी को , न समझो ।

नशा कोई , गैर ए शराब ।

तेरी मयखाने सी नज़र का ,

है ये असर ।

बन के पैमाना , जाम ए हुस्न ।

पिलाये जाती है , मुझे तेरे ये नज़र ।

तू बतला भी दे सखी ! 

क्या अपनों में हूँ ,  मैं तेरे ?

या ढूंढती है गैरों में , 

अब भी मुझे , तेरे ये नज़र ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी


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