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चलो अच्छा ही हुआ , इस कलयुगी जमाने से तुम ! रुख्सत हो गए ।

 चलो अच्छा ही हुआ , 

इस कलयुगी जमाने से तुम ! रुख्सत हो गए ।

वरना न जाने और क्या क्या ? 

मुसीबतों के बोझ , और उठाने को बाकी थे ।

तुम्हारी कमी , बहुत खल रही है हमें ।

खाते पीते उठते बैठते , सोते जागते ।

तुम हर वक्त , याद बहुत आते हो । 

मगर माँ ! तुम मेरे ख्वाबों में , क्यों नही आते हो ?

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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