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ऐसी भी क्या , नाराजगी है हमसे । हकीकत तो आना क्या था ?

 ऐसी भी क्या , नाराजगी है हमसे ।

हकीकत तो आना क्या था ?

अब तो तुम ख्वाबों में , भी नही आते ।

एक बार तो , मेरे ख्वाबों आ जाओ !

देखो बेताब हूँ , तुमसे मिलने को बहुत ।

आ कर मेरी , बाहों में समा जाओ ।

देख तुम्हें तो इश्क हुआ है , 

मेरे इस बैरागी मन को ।

बनकर राग कोई , प्रेम का तुम !

मेरी मन बंसी में , छिड़ जाओ ।

देखो बेताब हूँ मिलने को अब ,

मेरे ख्वाबों में आ जाओ ।

😘😘

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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