सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मैं ज़रा भीड़ से हट के , क्या चला था कि..

 मैं ज़रा  भीड़ से हट के , 

क्या चला था कि..

आज तक अकेला ही ,

 चले जा रहा हूँ मैं ।

खो सा गया हूँ मैं कुछ , 

इस कदर के , 

अपनी तन्हाइयों में ही , अक्सर ।

आये जाए कोई , 

मेरे अगल-बगल से , 

इसकी किसे है कोई खबर ।

मैं ज़रा भीड़ से हट के , 

क्या चला था  कि..  

रास्तों  में चिह्नित , 

पत्थर दरख़्त भी थे जो ।

वो उखाड़ , काट ले गया है कोई ।

जो चाहते थे के हम कभी , 

लौट कर वापस न आ सके ।

आज वो , भरी महफ़िल में ,

मेरी तारीफों के , कसीदे पढ़ा करते है  ।

✍🏿ज्योति प्रसाद रतूड़ी 




टिप्पणियाँ