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कभी कभी दर्द से , दो दो हाथ कर लेता हूँ ।

कभी कभी  दर्द से , दो दो हाथ कर लेता हूँ ।

उठाकर कलम यादों की , 

और तेरा नाम लिख लेता हूँ ।

बहुत दर्द हूँ छुपाये हम सीने में , के दिखाएँ तो दिखाएँ  कैसे ।

ये ज़ख़्म जो है मेरे सीने में , 

कम वक्त  हँसते बहुत है ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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