आ जाओ के दिल , बहुत करता है ।
तेरे नूर पे ...तेरे नूर पे यह , बहुत मरता है ।
आ जाओ के दिल , बहुत करता है...
तेरे गेसुओं में , लिपट जाने की 2
आदत है हमें ।
पास आ जाओ के ,तेरे गेसुओं में लिपट जाने का 2
जी बहुत करता है ।
वो घड़ी वो खयाल वो समा क्या याद है तुम्हें ।
मेरे आगोश में आना तेरा , ऐ "गुल बदन" ।
और मेरी सांसों में घुल कर महक जाना तेरा ।
आ जाओ फिर एक बार आगोश में मेरे ,
तेरी खुशबू चाहता है मेरा मन ।
बहक जाए एक बार फिर से हम, तो चले जाना तुम ।
आ जाओ के दिल...बहुत करता है ।
आ जाओ के दिल , बहुत करता है ।
तेरे नूर पे ...तेरे नूर पे यह , बहुत मरता है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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