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कुछ कुछ इधर भी नही , कटती है ये रातें ।

कुछ कुछ इधर भी नही , कटती है ये रातें ।

खामोश सी है ।

इक टकटकी सी ,लगी है ये नज़र ।

आशाओं की , राह जोहे ।

इक उम्मीद सी है तृण भर ,

दिखे वो तो , शायद पूरी होवे ।

क्या पता कब तलक , होगा इंतज़ार ।

कमल दल लिए , प्रेम सरोवर में ।

गाछ संग लिप्त , मन लिए स्वप्न ये ।

इक पूर्ण विराम तक ।

लिखे  कब ? जीवन के कोई शब्द नए ।

एक खोज मन की सखी , वो पूर्ण हो तुम ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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