सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

द्वापर समाप्त हो चला अब !

द्वापर समाप्त हो चला अब ! 

कलयुग ने है पैंठ जमाई  ।।

न राधा है अब , कोई यहाँ ।

न कोई , राधा का मोहन ।

न रुकमणी है अब ,कोई पिया की ।

न मीरा जैसी कोई जोगन ।।

समर्पण भाव , अब दिखता नही ।

मित्र असंख्य , ढूंढ सुदामा ,

किशन सा हितैसी , अब कोई नही ।

द्वापर समाप्त हो चला अब ! 

कलयुग ने है पैंठ जमाई  ।।(२)

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी


टिप्पणियाँ