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कोशिशें बहुत की मगर......हर कोशिश नाकाम हुई ।

कोशिशें बहुत की मगर......हर कोशिश नाकाम हुई ।

कोई तो नही जो , चाहे हमें भी 

उसी सिद्दत से ।

जैसा हमने चाह किसी को ।


अब तो जी चाहता है कि , 

अपनी चाहतों को ,

सुपुर्द ए खाक कर दूँ ।


या भर दूं आग , अपने सीने में इतनी के ,

 इस मतलबपरस्त जहां को , जलाकर  राख कर दूँ ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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