किसने कहा था ,
बैठने को ?
करके इश्क ।
हम तो कब से ,
कह रहे थे कि ,
आओ चले !
कुछ , आगे बढ़े ।
मगर तुम्हारे नखरे ,
वल्लाह !
क्या कहने ?
रहो अब बैठे !
क्यों तरस रही हो ?
तेरे संग हम भी तो ,
रह गए है , बढ़ने से आगे ।
लो थामो हाथ ,
अब भी क्या , बिगड़ा है ।
आओ चलें !
देखो , मौसम भी अच्छा है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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