दुःखी हूँ मगर , खुश रहने की अदाकारी ।
मुझे हर रोज , करनी पड़ती है ।
कभी दर्द छलक जाता है बाहर , तो रोक लेती हूँ ।
जख्म छुपाने की अदाकरी ,
हर रोज , मुझे करनी पड़ती है ।
गम का दरिया हूँ ,
ऐ नाशिबा तू ! क्या खूब मिला है ।
हर कश्ती पर सवार तेरी ,
आब ए फितरत पूछता है ।
इक तुम हो मलंग , जिससे चाहूँ में ,
बाँट सकू दर्द अपना ।
वरना चेहरे पर चेहरे , लगाने की अदाकरी ।
मुझे हर रोज , करनी पड़ती है ।
दुःखी हूँ मगर...
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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