मेरा तो भरोषा ही उठ चुका है अब ,
दोस्ती के नाम से ।
अच्छा होता तुझसे कभी , मुलाकात ही न होती ।
कम से कम सकुन तो रहता , आज जो बेचैन ये हुए जा रहे है हम !
न ख्यालों में हम तेरे रहते , न इन आँखों मे बेबसी के आँसू होते ।
करीब दिल के न तुझे हम लाते , न खुद से हम दूर जाते ।
आज हो चले है हम खुद से , इतना दूर के ।
अपने दिल की धड़कनों को भी , "चल रही है या नही"
महसूस नही कर पाते ।
तुझसे मिले कई दिन हुए , लगते वर्षो के समान ।
आ जा अब , मुलाकात को ।
कि तेरे बिना अब हमसे , रहा जाता नही ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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