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ना छेड़ो तुम धुन , बिरहा की

ना छेड़ो तुम  धुन , बिरहा की 

के मुझे मेरे गम , याद आए ।

 जिन्हें भुला चुके है हम , ब-मुश्किल । 

वो दर्द ए दिल , 

हमें वो सितमगर , फिर याद आए।

शाम जो हुई मेरे दिल की , 

फिर न कभी कोई , हसीं सुबह आई ।

बे दिल से मुस्कुराते रहे हम बदस्तूर , 

मुद्दत हुए , हमें शायद दिल से मुस्कुराए ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी


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