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हार चुका हूं , खुद से खुद मैं ।

हार चुका हूं , खुद से  खुद मैं ।

जीतू  संसार को , 

क्यों भला ? 

आखिर इस संसार में , रखा ही क्या है ?

हर तरफ है दुश्मन , 

इंसान के इंसान यहाँ ।

एक चेहरे पे कई चेहरे , लिए घूमते फिर रहे है ।

बनकर हमदर्द.....

पहचान मुश्किल है अब ।

कौन दोस्त है और , दुश्मन कौन  यहाँ है  ?

टूटते देखे है वफ़ा के रिश्ते , 

हल्की सी हवा के चलते ।

अब वो प्यार की , शीतल सी फुआर कहाँ है ?

हर तरफ है दुश्मन , 

इंसान के इंसान यहां ।

हार चुका हूं , खुद से ही खुद मैं ।

जीतू संसार को  , 

क्यों भला ? 

आखिर इस संसार में , रखा ही क्या ?

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