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तुम बनकर प्रेम वर्षा , वर्षो मेरे , हृदय धरा पर

तुम बनकर प्रेम वर्षा , 

वर्षो मेरे  हृदय धरा पर ।

वर्षो यूँ के , कभी थम न पाए ।

रहे शेष न , तृष्णा मन की ।

अग्नि विरह की , 

 कभी जल न पाए ।

तुम बनकर प्रेम वर्षा , 

वर्षो मेरे हृदय धरा पर ।

सघन काली घटा निराली ,

तेरे केशो ने कर डाली ।

रहे पड़े ये यूँ ही मुझ पर , 

सदा रहे ये शाम मतवाली ।

राधा तुम मेरे मन की , 

कान्हा मैं तेरा बन जाऊँ ।

आ डूबे ऐसे , प्रेम सागर में ।

तू मुझ में मैं तुझ में , समा जाऊं ।

तुम बनकर प्रेम वर्षा , 

वर्षो मेरे ,  हृदय धरा पर ।

वर्षो यूँ के , कभी थम न पाए ।

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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