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वक्त के तराजू पर , तुला मैं ।

 वक्त के तराजू पर , तुला मैं ।

 भाग्य के बाट से झोंका गया....


कभी ऊपर उठा , तो कभी नीचे झुका ।


हिण्डोला सा ही , हिलता रहा मैं 

अचेतन , अवस्था तलक ।

कब शांत हुआ. ....


न जाने कब शून्य पर रुकी , चाहत कोटि की ।


✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी


 

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