सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

माना कि , तरसती निगाहों का ।

माना कि , तरसती निगाहों का ।

मुमकिन नही है , पा जाना

दीदार ए यार....।

जिंदगी ! ये क्या  तू भी ?
रुख्सत हुई जाती हैं ।
ठहर तो कुछ देर , और सही ...
आने की उनकी अभी ,
थोड़ी सी उम्मीद बाकी है ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

टिप्पणियाँ