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ऐ जा कख लुकी च तू , भिंडी दिनु ह्वे (गढ़वाली)

 ऐ  जा कख लुकी च तू , 

भिंडी दिनु ह्वे ,

यों आँखियोंन नि , दिखी त्वे ।

मी छों यकुली...

यकुली यों रातियों मा ।

द्योरा बटी भी आज ,

 गैणा , ज्वान ...

कुज्याणी कख चली गैन।

उफ्फ या अन्ध्यारी राति .. रे

तेरी खुद भी , बोड़ी ऐन ।

ऐ जा कख लुकी च तू ,

 भिंडी दिनु ह्वे ।

टक लाई हेर्न छायी , 

आँसुल भोरी आँखि , 

आँसुल भोरी आँखि मेरी रे़ ।

औंदी ले सुपिन्या तू त....

यों आँखियों त म्यारी अब , निंद भी नि रै ।

भिंडी दिनु ह्वे ,

यों आँखियोंन नि , दिखी त्वे ।

ज्योति प्रसाद रतूड़ी....✍️


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