आओं करीब , तुम यूँ हमसे दूर क्यों हो ।
मुद्दतों से बुझी नही है प्यास ,
इन आँखों की ।
आओ करीब तुम्हें , जी भर के देख लूँ ।
आओ लग जाएं गले से ,
बहुत हुआ इंतिहान मोहब्बत का ।
बुझ जाए प्यास दिल की ,
अंजाम फिर जो होना हो...हो ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️
आओं करीब , तुम यूँ हमसे दूर क्यों हो ।
मुद्दतों से बुझी नही है प्यास ,
इन आँखों की ।
आओ करीब तुम्हें , जी भर के देख लूँ ।
आओ लग जाएं गले से ,
बहुत हुआ इंतिहान मोहब्बत का ।
बुझ जाए प्यास दिल की ,
अंजाम फिर जो होना हो...हो ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️
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