मैं समंदर हूँ दर्द का ।
जी चाहे ,
जितना भी दर्द दो ।
हम ,
उफ्फ तक न करेंगे ।
उठेंगी लहरें जब दर्द की ,
तो तुम्हें न संग में बहा ले जाए ।
हम अपनी लहरों को ,
तब , रोक न सकेंगे ।
मेरे साहिलों पर ,
आना , ज़रा संभाल कर ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️
मैं समंदर हूँ दर्द का ।
जी चाहे ,
जितना भी दर्द दो ।
हम ,
उफ्फ तक न करेंगे ।
उठेंगी लहरें जब दर्द की ,
तो तुम्हें न संग में बहा ले जाए ।
हम अपनी लहरों को ,
तब , रोक न सकेंगे ।
मेरे साहिलों पर ,
आना , ज़रा संभाल कर ।
ज्योति प्रसाद रतूड़ी.....✍️
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