शक तबाह कर देता है , कई जिंदगियाँ ।
इसके बीज ना बौना कभी ,
गर खुद पनपे यह ,दरम्याँ तुम्हारे तो ।
खर पतवार की तरह , उखाड़ कर
फैंक देना ।
वर्ना शक बर्बाद कर देता है ,
जीवन रुपी खेत में , प्रेम रुपी फसल को ।
भरोषे की खाद और विश्वास का जल ,
प्रेम की फसल को जिन्दा रखती है ।
आत्मसमर्पण प्रेम में बहुत जरुरी है ।
अन्यथा बिन बागवाँ का बाग ,
उजड़ा उजड़ा सा , खाली खाली सा ।
अजमाना नही कभी भी , प्रेम में एक दुसरे को ।
आजमाते आजमाते , दुरियां ही बढ जाती है ।
फिर पास आये भी तो क्या , दिलों में खठास लिये ।
गर हो अहसास अपनी गलतियों का तो ,
क्षमा मांग लो ।
यकीनन मिठास प्यार की सदा , बनी रहेगी ।
✍️ज्योति प्रसाद रतुड़ी
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें