उसने कहां था कभी , दोस्त बनते वक्त ।
मुझे न चाहना कभी बेइंतेहा...!
मेरा भरोसा नही ,
कभी भी छोड़ कर , चली जाऊंगी ।।
आज देख भी लिया है और,
जी भर रो भी लिया है ।
सिसकियां भरते रहे हम रातभर ,
और सोचते रहे यही ।
के हस्र यही होना था "मलंग"
दिल लगाकर उम्रभर रोना था ।
ये तो होना ही था , हो लिया , हो लिया , हो लिया ।
.....ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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