15 अगस्त सन 1947 को ,
हम इस दिन आजाद हुए थे ।
हां ऐसा सुना था पर महसूस नहीं हुआ ।
होता भी कैसे ? दबे कुचले रहे सदियों से।
पहले बाहर वालों ने दबाया था , और 47 के बाद अंदर वालों ने ।
अब भी उनके कदमों के निशाँ, मेरे आंगन से नहीं मिटे ।
देखकर उन्हें..।
यादों का वो भयानक मंजर , रह–रह याद आ जाते है ।
सभी बड़े बड़े ठाकुर , तख्ती हमारे नसीबों की जो लिख जाते है ।
अभी कहां उभरे हम आख़िरी जन है हम जो जंगल के ।
लगाकर हर कोई फेरा अपना ,चुनाव पर ।
बनाकर मूर्ख हमें ,और मुकद्दर अपना चमका जाते है ।
आज स्वतंत्रा दिवस है ,
हां ऐसा सुना था पर , महसूस नहीं हुआ ।
हां ऐसा सुना था पर , महसूस नहीं हुआ ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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