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थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से ।



थक गया हूं , फ़ज़ूल के इस सफर से ।


थोड़ा आ ऐ जिंदगी ! संग मेरे , तू भी सुस्ता ले ।

रहा है साथ तेरा जन्म से , और रहेगा मरण तक ।
सफर लम्बा रहा है , अब तलक ।

न जाने आगे रहेगा साथ , कब तलक ।
आ बैठ पास उर से निकल , पढ़ तो !

प्रभु ने भाग्य लेख में मेरे , क्या क्या रचना रची है ।

ढल गया हूं जिस्म से , देख तो ।
मेरे चेहरे पर चमक , कितनी बची है?

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी"मलंग"


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