कुछ ही सही मगर , हैं तो सही यादें ।
हसीं उन , गुजरे पलों की ।
न ही सही , लौटना मुमकिन नहीं ।
दिन वो हसीं मगर , ताजा तो है ।
यादें उनकी , मेरे इस ज़हन में ।
ताउम्र रहेगा मलाल ,
कुछ भी हासिल नहीं किया मुकाम *पंगरने का ।
धुंधलाती हुई नजर , अब फर्क क्या करें ।
लिखे नसीब में , अच्छा या बुरा ।
हां.....! अब तो आदत सी हो गई है , ठोकरों से दिल लगाने की ।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
*उन्नति ,तरक्की
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