रोना चाहूं भी मैं, मगर रो नहीं सकता,
कुछ दिल में दबा है तूफान, कहीं उमड़ गया तो?
मुश्किल होगी।
किया बहुत कुछ जिंदगी में, खुद को हासिल हुआ ही क्या?
आज सुनने में आ रहा है यह— "तुमने किया ही क्या?"
माना कि हुआ भी होगा, कुछ चूक नादानी में,
कौन है वो धुला दूध का? ज़रा सामने तो आ!
इतना भी निर्दय नहीं था मैं, जो अब—
विषाक्त शब्द-स्वरूपा बाण चलाने में न चूक रहे हो तुम।
दिल पर हाथ रखकर खाओ कसम,
कि क्या हकीकत में... बेपरवाह रहे थे हम?
— ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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