मैं वो अश्क हूं जो बूंद बन रुखसारों में सिमट गया ।
कम वक्त मेरी कोमल पलकों को भिगो के चला गया ।।
उम्मीद थी कि रहूंगा चैन से अब , लम्हे जिंदगी के चंद बचे जो कटेंगे बेफिक्र में ।
अरे ख्वाब भी क्या किसी के हकीकत हुए है कभी ?
आखिर नसीब ही तो था ऐ "मलंग" जो मेरे संग आया ,और मेरे संग चला जाएगा ।।
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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