खुद की पलकों को भिगोकर, खुद ही को पोंछना सीख लिया ।
दुनिया के मेलों में हमने, अकेले चलना सीख लिया।
माना कि उम्मीदों के महल, अक्सर ढह जाया करते हैं ।
पर 'मलंग' वही है जिसने राख में भी, मुस्कुराना सीख लिया। -
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
खुद की पलकों को भिगोकर, खुद ही को पोंछना सीख लिया ।
दुनिया के मेलों में हमने, अकेले चलना सीख लिया।
माना कि उम्मीदों के महल, अक्सर ढह जाया करते हैं ।
पर 'मलंग' वही है जिसने राख में भी, मुस्कुराना सीख लिया। -
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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