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उधार की हसरतें

 कवि हूं यारों कवि का क्या ? 

अपना क्या ? 

पराया क्या ?

गम क्या ?

खुशी क्या ?

तेरा क्या ? 

मेरा क्या ?

चला जहां भी , 

शब्द मिले गम के , या खुशी के कोई ।

लिप्त हुआ आंसुओं में , 

दिखा कोई मुस्कुराता हुआ , 

झट से पोंछ कर सैलाब ए अश्क , और मुस्कुरा दिया ।

कवि हूं यारों कवि का क्या ?

न दिल अपना न धड़कनें ही , उधार की है हर हसरतें भी ।

जख्म अपने है पर , दर्द के अहसास का पता नहीं ।

जिया जा रहा हूँ क्यों ?

पता नहीं ।

वक्त है भी क्या ? या नहीं ,

इस उधार की जिंदगी का क्या ?

आज है तो कल नहीं ।

कवि हूं यारों कवि का क्या ? 

अपना क्या ? 

पराया क्या ?

✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी

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