आज फिर मन , न जाने क्यों भर आया ।
अपनी खोई हुई मोहब्बत का ,
न जाने क्यों फिर ख्याल आया ।
दगा बाज़ तो , न कहेंगे हम उनको ।
न जाने क्यों उनकी वफ़ा पर ,
फिर आज सवाल आया ।
आज फिर मन , न जाने क्यों भर आया ।
बदगुमानियाँ रही कभी हमें , जिस मोहब्बत पर ।
न जाने क्यों आज , उस मोहब्बत पर हमें , गुमान आया ।
अपनी खोई हुई मोहब्बत का , न जाने क्यों फिर ख्याल आया ।
आज फिर मन न जाने क्यों भर आया ....
✍️ज्योति प्रसाद रतूड़ी
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